बुधवार, १३ जुलै, २०११

हिंदी पत्रकारिता का स्‍वर्णकाल एक धोखा था

हिंदी पत्रकारिता का स्‍वर्णकाल एक धोखा था
यह इंटरव्‍यू सन 96 में लिया गया। उस वक्‍त एसपी सिंह आजतक के संपादक थे। रविवार और नवभारत टाइम्‍स की पत्रकारिता ने उन्‍हें उस मुकाम पर पहुंचा दिया था, जहां से वह हिंदी पत्रकारिता को एक लाइन दे सकते थे। इस इंटरव्‍यू में एसपी ने हिंदी मीडिया को लेकर बनी-बनायी समझ और भ्रम से परतें हटाने की कोशिश की है। आज एसपी की पुण्‍य तिथि है। आज सबसे अधिक प्रासंगिक इस इंटरव्‍यू के साथ हम एसपी को श्रद्धांजलि दे रहे हैं।

हिंदी के अख़बार और बची हुई पत्रिकाओं की क्या दशा है? आप उनको किस स्थिति में पाते हैं?
हिंदी के अख़बारों की स्थिति बहुत अच्छी है। अगर उनकी तुलना पिछले पांच, दस, पंद्रह व बीस सालों से की जाए तो स्थिति अच्छी है। नेशनल रीडरशिप सर्वे की पांचवी रिपोर्ट आयी है। जो मोस्ट ऑथेंटिक रिपोर्ट है। उसमें देश के दस बड़े अख़बारों में इस बार पांच अख़बार हिंदी के हैं। पहले नंबर पर हिंदी का अख़बार पंजाब केसरी है। चार और हिंदी के अख़बार हैं दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, मध्य प्रदेश का नवभारत और दैनिक भास्कर। आज तक ऐसी स्थिति नहीं रही। 1977 में हिंदी का एक अख़बार पहली बार एक लाख की सरकुलेशन पर पहुंचा था। आज 17-18 साल बाद स्थिति यह है कि देश के बड़े अख़बारों में पांच हिंदी के हैं। उन दस में से हिंदी के अख़बारों का शेयर 52 प्रतिशत है। जिसमें अंग्रेज़ी और सभी भारतीय भाषाओं के अख़बार हैं।
पत्रिकाओं में स्थिति और भी ज़्यादा अच्छी है। देश की दस बड़ी पत्रिकाओं में से सात हिंदी की पत्रिकाएं हैं। बाकी तीन अंग्रेज़ी की हैं। इस देश में इतनी सुखद स्थिति तो हिंदी की कभी रही ही नहीं। पत्रिकाओं व दैनिकों सभी में हिंदी शिखर पर है। जितना लोग बता रहे हैं उतनी स्थिति बुरी नहीं हैं। पाठकों की संख्या बढ़ रही है। अख़बारों की पृष्ठ संख्या बढ़ रही है। अख़बारों में रंग बढ़ रहा है। विज्ञापन बढ़ रहा है। सब कुछ बढ़ रहा है। सिर्फ़ एक रोने का माहौल भी साथ-साथ चल रहा हैं।

कंटेंट के स्तर पर ये कहां हैं?
कंटेंट के स्तर पर देखने की बात अलग है। मुझे लगता है हिंदी का पूरा-का-पूरा जो माहौल हैं वह रोने का एक माहौल है। मैं पिछले कई सालों से देख रहा हूं कि लोग विलाप में लगे हुए हैं कि हिंदी की पत्र-पत्रिकाएं समाप्त हो रही हैं। कुछ पत्रिकाएं बंद हो रही हैं। उसमें टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन समूह की कुछ पत्र व पत्रिकाएं बंद हो गयी हैं। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि हिंदी में कोई भारी संकट आया हुआ है। जो भी उनका स्तर है, अंग्रेज़ी से उनकी तुलना करना मैं समझता हूं उचित नही है। अंग्रेज़ी की अपनी सारी-की-सारी इकोनॉमी अलग होती है। उनके काम का स्केल अलग होता है। 32, 64 पेज का वह अख़बार निकालते हैं, बेचते हैं। वह अलग मामला है। जहां तक अन्य भारतीय भाषाओं का सवाल है, उनमें हिंदी के अख़बार तुलनात्मक दृष्टि से बहुत बुरे नहीं हैं।
लेकिन कंटेंट के स्तर पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा है
कंटेंट के स्तर पर हिंदी के अख़बार कितने महान थे ज़रा आप मुझे बताएंगे? पहले हिंदी के चार पेज के राष्ट्रीय अख़बार हुआ करते थे। बाद में छह पेज के हुए। फिर आठ पेज के हुए। हिंदी पत्रकारिता का जिसे स्वर्णयुग कहते हैं, तब भी छह से आठ पृष्ठों के अख़बार हुआ करते थे, जिनमें आप कहीं भी कुछ भी उलटा-सीधा भरा करते थे। कोई महान परंपरा थी हिंदी पत्रकारिता, जो कि पिछले पांच साल में नष्ट हो गई हो ऐसा नहीं है।
पत्रिकाओं की दृष्टि से एक सूनापन नज़र आता है
सारी दुनिया में जहां पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक्सप्लोजन हो रहा है, उसमें पत्रिकाओं की स्थिति थोड़ी ख़राब होगी। इनमें वही पत्रिकाएं टिकेंगी जिनका अपना एक ख़ास पाठक-वर्ग है। जिन्होंने अपनी पत्रिकाओं का एकदम फोकस कर रखा है कि किसके लिए, किन विशेष पाठकों के लिए निकाल रहे हैं। जब मैं यह कह रहा हूं कि देश की दस बड़ी पत्रिकाओं में सात हिंदी की हैं तो सातों पत्रिकाएं ऐसी हैं जिनका फोकस बहुत साफ है। सरिता, मनोरमा या माया जो भी हैं अपने-अपने पाठक-वर्ग के प्रति उनका दिमाग़ साफ़ है किसके लिए वह निकाल रहे हैं।
इससे पहले हिंदी की जो पत्रिकाएं थीं, जो कि सफल पत्रिकाएं थीं। घालमेल पत्रिकाएं थीं। धर्मयुग था सबके लिए। साप्ताहिक हिंदुस्तान था सबके लिए। उसमें दो पन्ने बच्चों के लिए दो पन्ने महिलाओं के लिए। एक पन्ने में विज्ञापन। एक पन्ने में अमुक। एक पन्ने में चर्चा साहित्य। वह स्थिति तभी तक चल सकती थी। एक तो दैनिक कमज़ोर थे। उनके संडे एडिशन बहुत ही कमज़ोर थे। उसमें कलर नहीं था। अख़बारों में सिर्फ़ सरकार की दी हुई ख़बरें छपती थीं और वे मनोरंजन मुहैया नही कर पाते थे। इसलिए पत्रिकाएं उनके पूरक के रूप में चलती थीं। आज हिंदी के अख़बार इतने मजबूत हो रहे हैं, उनकी क्वालिटी की बात मैं अभी नहीं करूंगा, कि वे समाचार देते हैं, विचार देते हैं, फीचर देते हैं। रंगीन पृष्ठ देते हैं।

दूसरी तरफ टेलीविजन आपके सिर पर चढ़कर बैठा हुआ है। तो इसमें वे पत्रिकाएं जिनके दिमाग़ में यही साफ़-साफ़ नहीं है कि किस पाठक-वर्ग के लिए वह पत्रिका निकाल रहे हैं, पिटनी थीं और पिट गयी। इसमें रोना क्या?
तो क्या बेहतर अख़बार निकलेंगे?
जिस तरह के अख़बार निकल रहे हैं इनमें धीरे-धीरे प्रतियोगिता शुरू हो रही है। इसके कारण मुझे लग रहा है कि थोड़ी बेहतरी तो आ ही रही है। पहले एजेंसी की ख़बरों से सिर्फ़ अख़बार भरते थे। जिनको बड़े-बड़े राष्ट्रीय अख़बार कहते हैं वे भी सिर्फ़ एजेंसी की ख़बरों से छपते थे। आजकल मध्यप्रदेश के अख़बारों को या उत्तर प्रदेश के अख़बारों को ही लीजिए तो वे कोशिश करते हैं कि उनके प्रतिनिधि हों। मैंने दिल्ली में हिंदी अख़बारों के इतने बड़े-बड़े ब्यूरो कभी नहीं देखे, जितने बड़े ब्यूरो चल रहे हैं। वे विशेष ख़बरें देते हैं। बाहर संवाददाता भेजने लगे हैं। कहीं बड़ी घटना हो तो वहां अपने संवाददाता भेजने लगे हैं। जैसे-जैसे प्रतियोगिता बढ़ेगी वैसे-वैसे क्वालिटी बढ़ेगी। आप देखिए पहले हिंदी के अख़बारों में व्यापार की कितनी ख़बरें होती थीं। अमर उजाला को ही लीजिए। वहां पर न सिर्फ़ रोज़ व्यापार की ख़बरें होती हैं बल्कि सप्ताह में दो बार वे रंगीन बिजनेस सेक्शन देने लगे हैं। मैं समझता हूं कि यह बहुत बड़ा इंप्रूवमेंट है।

पत्रकारिता में प्रतिबद्धता का अभाव साफ़ नज़र आता है?
प्रतिबद्धता किसके प्रति? अब हम यह तुलना करें कि अपनी पत्रकारिता आज़ादी से पहले जैसी हिंदी पत्रकारिता हो या और कोई पत्रकारिता हो तो मैं समझता हूं यह लोगों से बहुत अव्यावहारिक अपेक्षा है। आज़ादी से पहले जो पत्रकारिता थी एक तो हम उसके स्केल को नहीं समझते हैं। लोग आजादी की लड़ाई के हथियार के रूप में पत्र निकालते थे। लेकिन उन पत्रों की लागत क्या होती थी? उसमें कितना पैसा लगता था? उस पैसे को लेकर आप एक लड़ाई लड़ सकते थे। आज एक पत्र निकालने के लिए जो लाखों-करोड़ों की पूंजी लगाएगा जाहिर है कि वह उस पूंजी से कुछ पैसा निकालेगा तभी तो लगाएगा। वरना क्यों लगाएगा? जो आदमी दुकान करता है, हम उससे अपेक्षा नहीं करते हैं कि अपनी पूंजी लगाकर वह प्रतिबद्धता के लिए सारी-की-सारी पूंजी लुटा दे। जो कारखाना लगाता है उससे नहीं करते। एक किसान अपना हल, बीज, खाद, पानी डालकर जो करता है वह भी अपनी लागत निकालने के लिए आंदोलन करता रहता है और कोशिश करता है कि उसे सही कीमत मिले। लेकिन अख़बार में जो आदमी पैसा लगाता है उससे हम यह अपेक्षा करते हैं कि नहीं साहब वह कमर्शियल न हो। वह मिशन के तौर पर निकाले। मिशन के तौर पर गीता प्रेस गोरखपुर तो निकल सकता है। वहां किसी एक संस्था का पैसा है। या कोई भी इस तरह की संस्था निकाल सकती है। लेकिन व्यक्ति या कोई उद्योग-समूह पूंजी लगाएगा तो जाहिर है कि उसमें से पैसा निकालने की कोशिश करेगा तो उसकी प्रतिबद्धता कई स्तरों पर होगी।
एक प्रतिबद्धता तो होगी पेशे के प्रति प्रतिबद्धता। सबसे ज़्यादा मेरे लिए महत्त्वपूर्ण यही है कि एक पत्रकार है और वह अपनी पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्ध है तो मैं समझता हूं कि वह ईमानदारी का काम कर रहा है। हम जो अख़बार निकाल रहे हैं, उसका उद्देश्य यह है कि हम लोगों के सामने अपनी कोई बात कहना चाहते हैं। क्या बात कहनी है? यह हमने तय किया है कि अमुक बात कहनी है और मैं उस बात को कहने जा रहा हूं। उसके प्रति ईमानदारी हो और सारा-का-सारा ध्यान उस पर लगा रहे कि उस बात को हम लोगों से कैसे कह सकते हैं। और उसको चलाने के लिए जितने पैसे की आवश्यकता हो उसमें से पैसा भी निकलता रहे। उसमें से लाभ भी होता रहे। लेकिन उसे हम किसी दूसरे टूल के रूप में इस्तेमाल न करें। तो वहां तक की प्रतिबद्धता तो हमारी समझ में आती है।
जैसे कि मैं समझता हूं कि एक शिक्षक की प्रतिबद्धता शिक्षण के प्रति होगी या एक वकील की प्रतिबद्धता अपने वकालत के पेशे के प्रति होगी। वैसे ही एक पत्रकार की प्रतिबद्धता पत्रकारिता के प्रति होनी चाहिए। लेकिन कहें कि नहीं साहब इसे छोड़-छाड़कर आप हमारे अमुक कॉज के लिए प्रतिबद्ध रहिए। अमुक कॉज के लिए आप प्रतिबद्ध हैं तो उस संस्था से कहिए या उस कॉज में विश्वास करने वाले लोगों से कहिए। उस तरह की पत्रिका निकालें और चलाएं। वह तंत्र क्या हो उसे वह समझें व चलाएं। वह उनकी अपनी परेशानी है। क्रांति के लिए निकालना चाहते हैं तो क्रांति का अख़बार निकालिए। लेकिन आप अपने क्रांतिकारी ढंग से उसकी पूंजी जुटाइए। लेकिन आप कोशिश करें कि नहीं हमारा अख़बार तो सेठ निकाले, सारे खर्चे सेठ बर्दाश्त करे और उसमें बैठकर क्रांति मैं करूं तो मैं समझता हूं कि यह अनुचित मांग हैं।
जैसे ही सत्ता बदलती है, शासक-वर्ग बदलता है तो वैसे ही अख़बार अपने को बदल लेते है
जाहिर है बदलने के पीछे कुछ एक कारण तो शुद्ध व्यावसायिक ही होते हैं। वही लोग बदलते हैं जिनकी पत्रकारिता के प्रति अपनी कोई प्रतिबद्धता नहीं। जिनकी पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता है, उनकी अपने जीवन-दर्शन के प्रति प्रतिबद्धता है। उन्हें मालूम है कि सरकार बदले, राज बदले या काज बदले हम जिस उद्देश्य के लिए पत्र निकाल रहे हैं उस उद्देश्य के लिए पत्र निकालते रहेंगे। 175 साल से लंदन से इकोनॉमिस्ट पत्रिका निकलती है। उसका जो उद्देश्य है उसमें आज तक एक कॉमा का परिवर्तन नहीं आया है। वह अपने हर अंक में ओपनिग पृष्ठ पर उस उद्देश्य को प्रकाशित करते हैं। कितने राज आये, कितने राज गये, कितने मंत्री गये, कितनी सरकारें बदलीं, पर वे उसे नहीं बदलते हैं।
मैं समझता हूं कि पूंजीवाद की सबसे अच्छी प्रतिनिधि पत्रिका इकोनॉमिस्ट है। पूंजीवाद के प्रति भी आप प्रतिबद्ध हैं तो भी अपनी प्रतिबद्धता को रखते हुए निकालेंगे लेकिन आपकी प्रतिबद्धता पूंजीवाद के प्रति नहीं है और अवसरवाद के प्रति प्रतिबद्ध हैं तो जब जैसा आएगा आप वैसा बनते जाएंगे। गंगूराम आये तो आप गंगूवादी हो गये। मंगूराम आये तो आप मंगूवादी हो गये। तो उनकी बात क्या करनी है।
कुछ ऐसे अख़बार निकल रहे हैं और जैसा सुनने में आ रहा है कि कुछ और निकलने वाले भी हैं जिनका उद्देश्य अपने हितों की रक्षा के लिए ही अख़बार निकालना है!
दरअसल ये हित हैं क्या? एक चिट फंड वाली कंपनी है। जिनका काम यह है कि ग़रीबों के पास जाकर, उन्हें अपने धोखेबाजी की योजना में फंसा लिया जाए और उसके बाद उनके पास से ज़्यादा-से-ज़्यादा पैसा खींचा जाए। और उससे जो परेशानियां पैदा हों उनसे बचने के लिए आप एक अख़बार निकाल लेते हैं। आपको समाज में प्रतिष्ठा मिलती हैं। प्रतिष्ठा से ज़्यादा आपके पास ब्लैकमेलिंग का एक औजार हो जाता है। मैं समझता हूं कि यह सरासर ग़लत है और इसके लिए अख़बार निकल रहे हैं। सिर्फ़ इसी के लिए क्यों, आप टटपूंजिए राजनीतिज्ञ हैं, अपनी राजनीति चलाने के लिए अख़बार निकाल लेते हैं, आप मोहल्ले के गुंडे हैं अपनी गुंडई को चलाने के लिए अख़बार निकाल लेते हैं, आप शराब के व्यापारी हैं और मजदूर नेता की हत्या करा देते हैं और अपने को बचाने के लिए अख़बार निकाल लेते हैं। इस तरह के जो अख़बार हैं उनको अख़बार नहीं कहना चाहिए। उनके प्रति हमें कोई बहुत ज़्यादा चिंतित भी नहीं होना चाहिए। जिस पाप के रास्ते में वे पैदा हुए हैं उसी पाप के रास्ते से समाप्त भी हो जाएंगे। वे हमारी बातचीत के विषय के योग्य नहीं हैं।

जिस प्रतिष्ठान से अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों के अख़बार निकल रहे हैं, तो यह बात सामने आती है कि वह हिंदी की उपेक्षा करते हैं।

हिंदी से पैसा नहीं आता है इसलिए उपेक्षा करते हैं। आप संयुक्त परिवार में देखिए कि वह बेटा जो सबसे ज़्यादा पैसा कमाता है उस पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाता है। घर में पांच बेटे कमा रहे हों तो जो सबसे ज़्यादा पैसे लाता है उसे हलवा-पूरी सबसे पहले देते हैं। जो सबसे कम लाता है, चाहे जितना मेहनती, ईमानदार और कितना भी सच्चरित्र हो, उसे सबसे आख़ि‍र में खाने का मौक़ा मिलता है। उसे सूखी रोटी ही दी जाती है। यह तो हम लोगों का भारतीय समाज है। इसमें अगर बड़े संस्थान में लोग ज़्यादा धन अपने अंग्रेज़ी अख़बारों को दे रहे हैं, जिनसे ज़्यादा पैसा मिल रहा है तो इस बात के लिए दोष क्यों देना है? इसे समझने की कोशिश कीजिए।

तो क्या हिंदी के अख़बार लाभ में नहीं आ सकते हैं?

हिंदी के अख़बार बहुत लाभ की ओर जा रहे हैं। देश के दस बड़े अख़बारों में जिन पांच अख़बारों का मैंने नाम बताया वे पांच ऐसे अख़बार हैं, जो किसी बड़े औद्योगिक या किसी बड़े अख़बार समूह के बाइ-प्रोडक्ट के रूप में नहीं निकल रहे हैं। वे अपने बूते पर निकलते हैं। उन अख़बारों के बूते पर उन संस्थानों का नाम है। और वे उसी को आगे बढ़ाते जा रहे हैं। दिन-दोगुना-रात चैगुना पैसा उसमें कमा रहे हैं। उनका पूरा ध्यान उसी में रहता हैं। अमर उजाला, दैनिक जागरण, भास्कर या राजस्थान पत्रिका के जो मालिक वहां पर हैं, इस तरह की दुविधा उनके मन में नहीं है, दुविधा उनके मन में हैं जहां हिंदी के अख़बारों के निकालने के ऐतिहासिक कारण हैं।

हिंदी के अख़बार क्यों निकले थे? वे हिंदी के प्रेम के कारण नहीं निकले थे। आजादी के बाद लोगों का यह लगा कि कि शायद इस देश में से अंग्रेज़ी समाप्त हो जाएगी। अंग्रेज़ों के जाते ही अंग्रेज़ी समाप्त हो जाएगी और हिंदी राष्ट्रभाषा बन जाएगी। तो रातो-रात इन लोगों ने हिंदी के अख़बार निकाल लिये। आप देखें कि टाइम्स ऑफ इंडिया का नवभारत टाइम्स 1946-48 के बीच निकला। जब आजादी की लड़ाई समाप्त हो रही थी और लग रहा था कि देश आजाद हो रहा है तो उसी समय हिंदुस्तान भी निकला। इनके अंग्रेज़ी के अख़बार बहुत पहले से हैं। और तो और, जनसत्ता बाद में भले ही निकला हो लेकिन करीब 1953 में वह पहले निकल चुका है। उस समय इन लोगों ने सोचा था कि राजनीतिज्ञों की जो नयी पीढ़ी आ रही है, वे शायद हिंदी जानने वाले होंगे। उन्हें प्रभावित करने के लिए हिंदी भाषा का अख़बार चाहिए। इन्हें ये भी लगा होगा कि शायद हिंदी ही देश की राष्ट्रभाषा बन जाए। हम व्यापार में न पिछड़ जाएं इसलिए हिंदी के अख़बार निकाल लिये। ओलिवेटी जैसी कंपनी, जो टाइपराइटर बनाती है, ने उस समय ’1947-48 में हिंदी का टाइपराइटर यह सोच का निकाल दिया था कि शायद देश में हिंदी के लाखों टाइपराइटरों की जरूरत पड़े। फिर सब का भ्रम ख़त्म हो गया। इस देश में अंग्रेज़ी ही रहेगी जाने वाली नहीं है। ओलिवेटी का भी भ्रम ख़त्म हो गया। उसने भी मॉडल बनाना बंद कर दिया। सेठों का भी भ्रम ख़त्म हो गया। वे भी अंग्रेज़ी में जुट गये। तो इनकी तब भी प्रतिबद्धता व्यापार के प्रति थी। तब भी कमिटमेंट उससे उतना ही व्यापारिक लाभ लेने के प्रति था। हिंदी, हिंदी समाज या हिंदी भाषी पाठकों के प्रति नहीं था। तो अपने काम को अब वे नंगे रूप में कर रहे हैं।

संपादक नाम की संस्था को ख़त्म किया जा रहा है। क्षेत्रीय अख़बारों में तो मालिक ही संपादक हैं। लेकिन महानगरों से निकलने वाले बड़े अख़बारों में संपादक का कद कम कर दिया है। वहां मैनेजर या कॉरपोरेट के लोग ज़्यादा हावी हैं। इससे पत्रकारिता पर किस तरह का असर पड़ेगा?

कई तरह के असर पड़ेंगे। एक तो पत्रकारिता का जो प्रोफेशनल स्वरूप है वह समाप्त हो रहा है। काम तो कोई भी चला लेता है। आप बहुत बड़ा कारखाना लगाएं। उसमें आप मैकेनिकल इंजीनियर रखने की बजाए एक मैकेनिक को रख दीजिए। तो वह काम तो चला ही लेगा। लेकिन वह काम ही चला सकता है उसे कोई नयी दिशा नहीं दे सकता है। उसे कहीं आगे नहीं बढ़ा सकता है। उसका कोई विजन नहीं होगा. तो वह अब अख़बारों में साफ़ झलकने लगा है।

मालिक का संपादक होना, मैं कोई बुरा नहीं मानता। अगर मालिक है और उसके योग्य है कि संपादक हो तो उसमें कोई बुराई नहीं है। मैं बहुत सारे मालिकों को जानता हूं जो कई बहुत सारे प्रोफेशनल संपादकों से बहुत अच्छे संपादक हैं। यहीं (आज तक, इंडिया टुडे ग्रुप) जहां मैं बैठा हुआ हूं मैं समझता हूं कि अरुण पुरी इस देश के सर्वश्रेष्ठ संपादकों में से एक हैं। उनकी अयोग्यता इसलिए नहीं होनी चाहिए कि वह मालिक हैं इसलिए संपादक नहीं बन सकते। पहले मैं जहां (टेलीग्राफ में) था अभिक सरकार (आनंद बाज़ार पत्रिका) मैं समझता हूं कि बहुत ही उच्च कोटि के संपादक हैं। हिंदू अख़बार है, जहां एन राम या उनके परिवार के लोग बैठे हैं, बहुत ही अच्छे संपादक हैं. ऐसा भी नहीं हैं कि मालिक संपादक कोई पहली बार हुआ है। आजादी की लड़ाई में जो भी अख़बारों की बड़ी भूमिका थी वे मालिक संपादक लोग ही थे। बाद के भी प्रोफेशनल संपादक कब आए?

आजादी के बाद संपादकों की एक पीढ़ी आयी जो बड़े घरानों ने बनायी। उस समय भी उनको पता नहीं था कि इनकी कितनी आवश्यकता है। इनकी क्या भूमिका है। फिर बाद में पता चला कि अरे यह तो बहुत सारे बिना रीढ़ के लोग संपादक बन कर आये हैं। जिनका काम ही था मालिकों की जी-हजूरी करना। मालिकों के काम के लिए उनकी दलाली करना। सरकार में दलाली करना। ब्यूरोक्रेसी में दलाली करना। सत्ता में दलाली करना। जब उनको लगा कि ऐसे संपादक हैं, जो दलाली का ही काम करते हैं और दलाली का काम करके हमें लाभ पहुंचा रहे हैं तो उन्हें बिचैलियों की भूमिका की आवश्यकता नहीं रही। जहां तगड़े संपादक थे वहां संपादक हैं। संपादक जो स्पीसीज़ है इसको कोई समाप्त नही कर पाएगा। क्योंकि ये प्रोफेशनल ट्रेंड-हुनर जानने वाले लोग हैं। इनकी आवश्यकता हमेशा रहेगी। आप अच्छा अख़बार निकालने जाएंगे, बड़े बनने की कोशिश करेंगे तो आपको संपादक कहें, कार्यकारी संपादक कहें, सह-संपादक कहें या मुख्य उप-संपादक कहें, जहां भी बिना संपादक के अख़बार निकल रहे हैं वहां संपादक तो हैं आपने उसका पदनाम बदल दिया है। इसकी बार्गेनिंग क्षमता कितनी है, इसका उसकी तनख्वाह से पता चलता है। यह संक्रमण-काल है थोड़े दिनों तक ऐसा चलेगा फिर अपने आप ठीक हो जाएगा।

मैं नाम गिना सकता हूं ऐसे संपादकों के जिनकी पूरी-की-पूरी जेनरेशन निकल गयी है। जो चाटुकार थे, दलाल थे, बिचौलिये थे, कमीशनखोर थे। वे ससुरे रहें या न रहें उससे हमें क्या ख़ास फर्क पड़ता है? न हमें फर्क पड़ता है और न ही हिंदी पत्रकारिता को।

असल में जो लाइज़निंग करने वाले हैं उनकी संख्या काफी बढ़ी है

बढ़ेगी ही। क्योंकि पूरा-का-पूरा विस्तार इस तरह से हो रहा है। पहले क्या था कि कोई एक जूट मिल का मालिक एक अख़बार निकाल लेता था तो पूरे जूट-उद्योग का स्वार्थ उसके साथ-साथ था। अब ऐसा नहीं है। अब एक चिटफंड जो सिर्फ़ अलीगढ़ में चलता है, अख़बार निकालकर बैठा है। दूसरा चिटफंड सिर्फ़ गोरखपुर में चलता है वह भी निकाले बैठा है। कोई माफिया है, शराब बनाकर बेच रहा है, तो वह अख़बार निकाले बैठा है। और अख़बारों की जो स्थिति है उसमें पत्रकारों की भूमिका कोई कम नहीं है। इस दलाली को बढ़ाने में पत्रकारों की भी अहम भूमिका है। दलाली भी बढ़ी है। लेकिन मैं कह रहा हूं उसमें अच्छी पत्रकारिता भी हो रही है, उसी में आप दुनिया भर की ऐसी रिपोर्टें भी देख रहे हैं जो कि इसके पहले आप कल्पना नहीं कर सकते थे। जिसको हम एक भारतीय पत्रकारिता का स्वर्ण-युग कहते हैं उसमें एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग हुई हो आप मुझे एक उदाहरण नहीं दे सकते। किसी सरकार की आलोचना हुई तो ऐसा एक संपादकीय मुझे नहीं दिखा सकते। ’50-’60 और ’70 के दशक तक आते-आतेकोई नहींसरकार जो करे महान। नेहरू जी संसार के सबसे बड़े नेता। हमारा देश समाजवादी देश। कहीं आपने सुनी कोई आलोचना। तो आज जो यह दलाल पत्रकारिता है, आज जो चाटुकार पत्रकारिता है यह कम-से-कम कुछ एक सवाल तो खड़े करती है। आप कहेंगे जिन कारणों से भी करती हो, नक्कारखाने में तूती की आवाज़ हो लेकिन होती है। इस देश में इससे पहले तो पूरी-की-पूरी भाट व चारण पत्रकारिता थी। अब मैं नाम नहीं लूंगा। आप खुद कल्पना कीजिए बडे़-बड़े अख़बारों के कौन-कौन संपादक हुए हैं। और उनके क्या-क्या काम थे? किन-किन कारणों से संपादक हुए? और क्यों बनाये जाते थे। क्यों रहते थे? क्या करते थे और क्या लिखते थे? इमरजेंसी के बाद, 77 के बाद जाकर हिंदी पत्रकारिता की थोड़ी खोजबीन शुरू की। लेकिन चूंकि हम लोग पास्ट (भूत) में जीने के आदी हैं। महान, इतना महान स्वर्ण-युग था, समाप्त हो गया। देखिए साहब! बैठकर रो रहे हैं। ऐसा कुछ नहीं था। मैं यही जानने के लिए एक बार नेशनल आर्काइव्ज में जाकर पुराने पत्रों को, जो महान पत्र कहे जाते थे, पढ़कर देख आया कि कितनी क्रांतिकारिता हुई?

इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया अख़बारों के सामने किस तरह की चुनौती रख रहा है?

बहुत बड़ी चुनौतियां हैं। उसके कारण अख़बारों को बदलना पड़ रहा है। मैं तो हाल ही में इस मीडियम में आया हूं। मैं देख रहा हूं कि यह मीडियम बहुत ज्यादा अनुशासन मांगता है। इसका व्याकरण अलग है। इसमें फालतू बात की गुंजाइश नहीं है। इसमें अनाप-शनाप ख़बरें देने में मुश्किल आती है। अख़बार में तो आप बैठे-बैठे लिख देते हैं कि सूत्रों ने बताया और कोई भी काल्पनिक कहानी लिख देते हैं। यहां तो कोई रिपोर्ट बनाने से पहले आपको जिस आदमी ने बताया उसको दिखाना पड़ता है। उसको बोलते हुए दिखाना पड़ता है। तो जैसे-जैसे इसका विस्तार होगा वैसे-वैसे अख़बारों पर दबाव पड़ेगा। इस माध्यम से हम जो रिपोर्ट बता रहे हैं उसमें वह आदमी बोलता है। हम कहें कि उस घटनास्थल पर लाखों की भीड़ मौजूद थी तो लाखों की भीड़ के सामने एक बार कैमरा आपको ले जाना पड़ता है।

इसमें अख़बार टिक पाएंगे?

टिकना होगा अख़बारों को। सारी दुनिया में अख़बार टिके हैं। जहां बीबीसी, सीएनएन निकलता है, वहां अख़बार टिके हुए हैं। लेकिन अख़बार अपने आप को बदलते हैं। उनकी रिपोर्टिंग का तरीका बदलता है। छपाई बदलती हैं। रंग बदलते हैं। उनका सोचने का सारा ढंग बदलता है। आज हमारे अख़बारों में क्या है। कोई अख़बार उठाकर देख लीजिए अगर पीआईबी और सरकारी सूत्रों से ख़बर आनी बंद तो आपको वह सारा बदलना पड़ेगा, जिसे भोजपुरी में कहते हैं, अपना जांगर ठठाना पड़ेगा। घटना-स्थल पर जाएंगे। देखेंगे, ख़बरों को ढूंढेंगे। वास्तविक ख़बरें देंगे।

हमें पत्रकारिता में छोटी-सी बात बतायी गयी थी कि आप भविष्यकाल की ख़बरें देना बंद कर दें तो फिर देखें। पुल बनेगा, सड़कें बनेगी, टेलीफोन लगेगा। दो सौ करोड़ रुपए आएंगे। आमुक होगागा-गे-गी होता है। गा-गे-गी निकाल कर जो समाचार करना शुरू करेंगे वे बचेंगे। जो नहीं करेंगे समाप्त हो जाएंगे। बाज़ार की मार वहां पड़ेगी और इसके लिए भी विलाप करने की आवश्यकता नहीं हैं। जो समाप्त हो गये सो हो गये।

समकालीन जनमत (फरवरी, 1996) के पत्रकारिता विशेषांक से साभार

रविवार, १० जुलै, २०११

इंतजार में हैं एसपी ……

निरंजन परिहार-----
खबरें आपके इंतजार में हैं एसपी…..
---  निरंजन परिहार --
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वह शुक्रवार था। काला शुक्रवार। इतना काला कि वह काल बनकर आया। और हमारे एसपी को लील गया। 27 जून 1997 को भारतीय मीडिया के इतिहास में सबसे दारुण और दर्दनाक दिन कहा जा सकता है। उस दिन से आज तक पूरे चौदह साल हो गए। एसपी सिंह हमारे बीच में नहीं है। ऐसा बहुत लोग मानते हैं। लेकिन अपन नहीं मानते। वे जिंदा है, आप में, हम में, और उन सब में, जो खबरों को खबरों की तरह नहीं, जिंदगी की तरह जीते हैं। यह हमको एसपी ने सिखाया। वे सिखा ही रहे थे कि..... चले गए।
एसपी। जी हां, एसपी। गाजीपुर गांव के सुरेंद्र प्रताप सिंह को इतने बड़े संसार में इतने छोटे नाम से ही यह देश जानता हैं। वह आज ही का दिन था, जब टेलीविजन पर खबरों का एकदम नया और गजब का संसार रचनेवाला एक सख्स हमारे बीच से सदा के लिए चला गया। तब दूरदर्शन ही था। जिसे पूरे देश में समैन रूप से सनातन सम्मान के साथ स्वीकार किया जाता था। देश के इस राष्ट्रीय टेलीविजन के मेट्रो चैनल की इज्ज्त एसपी की वजह से बढ़ी। क्योंकि वे उस पर रोज रात दस बजे खबरें लेकर आते थे। पर, टेलीविजन के परदे से पार झांकता, खबरों को जीता, दृश्यों को बोलता और शब्दों को तोलता वह समाचार पुरुष खबरों की दुनिया में जो काम कर गया, वह आजतककोई और नहीं कर पाया। 27 जून, 1997 को दूरदर्शन के दोपहर के बुलेटिन पर खबर आई – ‘एसपी सिंह नहीं रहे।और दुनिया भर को दुनिया भर की खबरें देनेवाला एक आदमी एक झटके में खुद खबर बन कर रह गया। मगर, यह खबर नहीं थी। एक वार था, जो देश और दुनिया के लाखों दिलों पर बहुत गहरे असर कर गया। रात के दस बजते ही पूरे देश को जिस खिचड़ी दढ़ियल चेहरे के शख्स से खबरें देखने की आदत हो गई थी। वह शख्स चला गया। देश के लाखों लोगों के साथ अपने लिए भी वह सन्न कर देनेवाला प्रहार था।
अपने जीवन के आखरी न्यूज बुलेटिन में बाकी बहुत सारी बातों के अलावा एसपी ने तनिक व्यंग्य में कहा था – ‘मगर जिंदगी तो अपनी रफ्तार से चलती रहती है।टेलीविजन पर यह एसपी के आखरी शब्द थे। एसपी ने यह व्यंग्य उस तंत्र पर किया था, जो मानवीय संवेदनाओं को ताक में रखकर जिंदगी को सिर्फ नफे और नुकसान के तराजू में तोलता है। उस रात का वह व्यंग्य एसपी के लिए विड़ंबना बुनते हुए आया, और उन्हें लील गया। इतने सालों बाद भी अपना एसपी से एक सवाल जिंदा है, और वह यही है कि - खबरें तो अभी और भी थीं एसपी... और जिंदगी भी अपनी रफ्तार से चलती ही रहती, पर आप क्यों चले गए। इतने सालों बाद आज भी हमको लगता है, कि न्यूज टेलीविजन और एसपी, दोनों पर्याय बन गए थे एक दूसरे का। आजतकको जन्म देने, उसे बनाने, सजाने संवारने और दृश्य खबरों के संसार में नई क्रांति लाकर खबरों के संसार में नंबर वन बन बैठे एसपी ने आजतकको ही अपना पूरा जीवन भी दान कर दिया। जीना मरना तो खैर अपने हाथ में नहीं है, यह अपन जानते हैं। मगर फिर भी, यह कहते हैं कि एसपी अगर आजतकमें नहीं होते, तो शायद कुछ दिन और जी लेते।
एसपी सिंह की पुण्यतिथि 27 जून पर विशेषवह बॉर्डरथी, जो एसपी की जिंदगी की भी बॉर्डरबन आई थी। सनी देओल के बेहतरीन अभिनय वाली यह फिल्म देखने के लिए दिल्ली के उपहारसिनेमा में उस दिन बहुत सारे बच्चे आए थे। वहां भीषण आग लग गई और कई सारे बच्चों के लिए वह सिनेमाघर मौत का उपहारबन गया। बाकी लोगों के लिए यह सिर्फ एक खबर थी। मगर बेहद संवेदनशील और मानवीयता से भरे मन वाले एसपी के लिए यह जीवन का सच थी। जब बाकी बुलेटिन देश और दुनिया की बहुत सारी अलग अलग किस्म की खबरें परोस रहे थे, तो उस शनिवार के पूरे बुलेटिन को एसपी ने बॉर्डरऔर उपहारको ही सादर समर्पित कर दिया। टेलीविजन पर खबर परोसने में यह एसपी का अपना विजन था। शनिवार सुबह से ही अपनी पूरी टीम को लगा दिया। और शाम तक जो कुछ तैयार हुआ, उस बुलेटिन को अगर थोड़ा तार तार करके देखें, तो उसमें एसपी का एक पूरा रचना संसार था। जिसमें मानवीय संवेदनाओं को झकझोरते दृश्यों वाली खबरों को एसपी ने जिस भावुक अंदाज में पेश किया था, उसे इतने सालों बाद भी यह देश भूला नहीं है। दरअसल, वह न्यूज बुलेटिन नहीं था। वह कला और आग के बीच पिसती मानवीयता के बावजूद क्रूर अट्टहास करती बेपरवाह सरकारी मशीनरी और रुपयों की थैली भरनेवाले सिनेमाघरों के स्वार्थ की सच्चाई का दस्तावेज था। एसपी ने उस रात के अपने इस न्यूज बुलेटिन में इसी सच्चाई को तार तार किया, जार जार किया और बुलेटिन जैसे ही तैयार हुआ, एसपी ने बार बार देखा। फिर धार धार रोए। जो लोग एसपी को नजदीक से जानते थे, वे जानते थे कि एसपी बहुत संवेदनशील हैं, मगर इतने...?
दरअसल, एसपी के दिमाग की नस फट गई थी। जिन लोगों ने शुक्रवार के दिन बॉर्डरदेखने उपहारमें आए बच्चों की मौत के मातम भरे मंजर को समर्पित शनिवार के उस आजतक को देखा है, उन्होंने चौदह साल बाद भी आजतक उस जैसा कोई भी न्यूज बुलेटिन नहीं देखा होगा, यह अपना दावा है। और यह भी लगता है कि हृदय विदारक शब्द भी असल में उसी न्यूज बुलेटिन के लिए बना होगा। एसपी की पूरी टीम ने जो खबरें बुनीं, एसपी ने उन्हें करीने से संवारा। मुंबई से खास तौर से बॉर्डरके गीत मंगाए। उन्हें भी उस बुलेटिन में एसपी ने भरा। धू धू करती आग, जलते मासूम, बिलखते बच्चे, रोते परिजन, कराहते घायल, सम्हालते सैनिक, और मौन मूक प्रशासन को परदे पर लाकर पार्श्व में संदेसे आते हैं...की धुन एसपी ने इस तरह सजाई गई कि क्रूर से क्रूर मन को भी अंदर तक झकझोर दे। तो फिर एसपी तो भीतर तक बहुत संवेदनशील थे। कोई बात दिमाग में अटक गई। यह न्यूज बुलेटिन नहीं, आधे घंटे की पूरी डॉक्यूमेंट्री थी। और यही डॉक्यूमेंट्रीनुमा न्यूज बुलेटिन एसपी के दिमाग की नस को फाड़ने में कामयाब हो गया।
जिंदगी से लड़ने का जोरदार जज्बा रखनेवाले एसपी अस्पताल में पूरे तेरह दिन तक उससे जूझते रहे। मगर जिंदगी की जंग में आखिर हार गए। सरकारी तंत्र की उलझनभरी गलियों में अपने स्वार्थ की तलाश करनेवालों का असली चेहरा दुनिया के सामने पेश करनेवाले अपने आखरी न्यूज बुलेटिन के बाद एसपी भी आखिर थक गए। बुलेटिन देखकर अपने दिमाग की नस फड़वाने के बाद तेरह दिन आराम किया और फिर विदाई ले ली। पहले राजनीति की फिर पत्रकारिता में आए एसपी ने 3 दिसंबर 1948 को जन्मने के बाद गाजीपुर में चौथी तक पढ़ाई की। फिर कलकत्ता में रहे। 1964 में बीए के बाद राजनीति में आए, पर खुद को खपा नहीं पाए। सो, 1970 में कलकत्ता में खुद के नामवाले सुरेंद्र नाथ कॉलेज में लेक्चररी भी की। पर, मामला जमा नहीं। दो साल बाद ही धर्मयुगप्रशिक्षु उप संपादक का काम शुरू किया। फिर तो, रुके ही नहीं। रविवार, नवभारत टाइम्स और टेलीग्राफ होते हुए टीवी टुडे आए। और यहीं आधे घंटे का न्यूज बुलेटिन शुरू करने का पराक्रम किया, जो उनसे पहले इस देश में और कोई नहीं कर पाया। वे कालजयी हो गए। कालजयी इसलिए, क्योंकि दृश्य खबरों के संसार का जो ताना बाना उनने इस देश में बुना, उनसे पहले और उनके बाद और कोई नहीं बुन पाया।
टेलीविजन खबरों के पेश करने का अंदाज बदलकर एसपी ने देश को एक आदत सी डाल दी थी। आदत से मजबूर उन लोगों में अपने जैसे करोड़ों लोग और भी थे। लेकिन मीडिया में अपन खुद को खुशनसीब इसलिए मानते हैं, क्योंकि अपन एसपी के साथ जब काम कर रहे थे, तो उनके चहेते हुआ करते थे। अपन इसे अपने लिए गौरव मानते रहे हैं। एसपी जब टेलीविजन के काम में बहुत गहरे तक डूब गए थे, तो उनने एक बार अपन से कहा था जो वे अकसर कईयों को कहा करते थे – ‘यह जो टेलीविजन है ना, प्रिंट मीडिया के मुकाबले आपको जितना देता है, उसके मुकाबले आपसे कई गुना ज्यादा वसूलता है।एसपी ने बिल्कुल सही कहा था। टेलीविजन ने एसपी को शोहरत और शाबासी बख्शी, तो उसकी कीमत भी वसूली। और, यह कीमत एसपी को अपनी जिंदगी देकर चुकानी पड़ी। मगर आपने तो आखरी बार भी यही कहा था एसपी कि - जिंदगी तो अपनी रफ्तार से चलती रहती है।पर, जिंदगी तो थम गई। मगर खबरें अभी और भी हैं जो आज भी खबर हो जाने के लिए एसपी का इंतजार कर रही हैं|(माझे फेसबुक मित्र श्री दिलीप मंडल यांच्या वॉलवरून साभार
मेरे फेसबुक मित्र श्री दिलीप मंडल साहब की वॉल से साभार ..)
संकलनः- वैभव छाया  

सचमुच ही मीडिया के महानायक थे एसपी सिंह

राजेश त्रिपाठी
मुझ जैसे कई पत्रकारों को हिंदी साप्ताहिक 'रविवार' में 10 साल तक एसपी के साथ काम करने और सार्थक पत्रकारिता से जुड़ने का अवसर मिला। हमने उस व्यक्तित्व को समीप से जाना-पहचाना जो साहसी व सुलझा हुआ था और जिसे खबरों की सटीक और अच्छी पहचान थी। सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता की उन्होंने जो शुरुआत इस साप्ताहिक से की, वह पूरे देश में प्रशंसित-स्वीकृत हुई। यह उनकी सशक्त पत्रकारिता का ही परिणाम था कि 'रविवार' ने सत्ता के उच्च शिखरों तक से टकराने में हिचकिचाहट न दिखायी।
इसके चलते 'रविवार' के खिलाफ कोई न कोई मामला दर्ज होता ही रहता था। लेकिन विश्ववसनीयता इतनी थी कि विधानसभाओं तक में इसके अंक प्रमाण के तौर पर लहराए जाते थे। खबरों की उनकी पकड़ का एक प्रमाण भागलपुर आंखफोड़ कांड की घटना से समझा जा सकता है। यह खबर 'आर्यावर्त' के भीतरी पृष्ठ पर इस तरह से उपेक्षित ढंग से छपी थी कि कहीं किसी की नजर न पड़ सके। एसपी को यह बहुत खराब लगा। पत्रकार धर्म की यह उदासीनता उन्हें भीतर तक कचोट गई। उन्होंने हमारे एक साथी अनिल ठाकुर को (जो भागलपुर के ही रहने वाले हैं) तत्काल भागलपुर भेजा और भागलपुर आंखफोड़ कांड का काला अध्याय 'रविवार' की आमुख कथा बना। जैसा स्वाभाविक है, तहलका मच गया। इसके बाद अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं ने भी इसे प्रमुखता से छापा। अफसोस इस बात का है कि अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं को तो इस पर पुरस्कार मिले लेकिन 'रविवार' जिसने इस स्टोरी को प्रमुखता से ब्रेक किया, के हिस्से सिर्फ पाठकों और चहानेवालों की शुभकामनाएं ही आईं। यहां कहना पड़ता है कि अगर हिंदी अब भी दासी है तो इसके दोषी शायद हम हिंदीभाषी या कहें हिंदीप्रेमी भी हैं।

मैंने जिक्र किया कि 'रविवार' व्यवस्था विरोधी (सारी व्यवस्था नहीं, वह जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हो) पत्र था इसलिए मामले उस पर होते ही रहते थे। इसी तरह का एक प्रसंग याद आता है। हम सभी आनंद बाजार प्रकाशन समूह के प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट स्थित कार्यालय में काम कर रहे थे। एसपी अपने चेंबर में थे। अचानक कुछ पुलिस अधिकारी उनसे मिलने आए। स्थानीय पुलिस अधिकारी अक्सर उनसे मिलने आते रहते थे। हम लोगों ने सोचा, वैसे ही कोई अधिकारी होंगे। कार्य में व्यस्त रहने के कारण हम लोग उनका परिचय नहीं पूछ सके और उनको एसपी के चेंबर में जाने दिया। थोड़ी देर में एसपी चेंबर से उन लोगों के साथ निकले और बोले-'अरे, भइया जरा पूछ लिया करो कि कौन हैं, कहां से हैं, ये मध्य प्रदेश पुलिस के अधिकारी हैं। मैं गिरफ्तार हो चुका हूं और अब जमानत लेने जा रहा हूं।' हमें याद आया कि मध्य प्रदेश विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष पर एक स्टोरी 'रविवार' में छपी थी और उन्होंने मामला कर दिया था। उसके बाद से एसपी ने अग्रिम जमानत ही ले रखी थी।
सहजता तो जैसे उनका अभिन्न अंग था। 'रविवार' ज्वाइन करने के बाद मैं उनके गृहनगर श्यामनगर के पास गारुलिया गया तो पाया वे चंदन प्रताप सिंह को दुलार रहे हैं। चंदन तब छोटे थे। थोड़ी देर तक उनसे बातें होती रहीं फिर बोले- 'चलो भइया, तुमको फुटबाल दिखाते हैं।' हमने समझा कि कहीं फुटबाल मैच हो रहा होगा, उसे दिखाने ले जा रहे हैं। लेकिन यह क्या? गारुलिया में हुगली के तट पर बरसात के उस मौसम में कीचड़ से भरे एक मैदान में एसपी दा अपने बड़े भाई नरेंद्र प्रताप सिंह व अन्य लोगों के साथ फुटबाल खेलने उतर गए। कुछ देर बाद कीचड़ से वे इचने लथपथ हो गए कि उनको पहचान पाना मुश्किल हो रहा था। उनमें बाल सुलभ सहजता और सरलता थी। बहुत कुछ कहती थी हलकी दाढ़ी वाले रोबीले चेहरे पर चमकती उनकी भावभरी आंखें।
जो भी उनके साथ काम कर चुका है, उनके खुलेपन और अपने सहकर्मियों के प्रति भ्रातृवत व्यवहार को आजीवन याद रखेगा। कभी भी उन्हें किसी सहकर्मी से ऊंची आवाज में बात करते नहीं देखा। कुछ गलती होती तो सहजता से समझाते और कहते-आप अपना लिखा किसी और से भी चेक करा लिया करें। अपने साथी गलती पकड़ेंगे तो उसमें शर्म की कोई बात नहीं। अगर गलती छूट गयी तो कल लाखों लोगों के सामने शर्मशार होना पड़ेगा और जवाबदेह होना पड़ेगा। एक बार की बात है। हम लोग कुछ खाली थे और कार्यालय में रवीन्द्र कालिया जी का उपन्यास 'काला रजिस्टर' पढ़ रहे थे। उन्होंने देखा तो कहा- 'भइया, ऐसे मजा नहीं आएगा। आओ मैं इस उपन्यास के पात्रों का परिचय दे दूं। कालिया जी ने हम लोगों के साथ रहते हुए ही इसे लिखा है और हमें जितना लिखते जाते, सुनाते भी जाते थे। अच्छा है मजा आयेगा।'
एसपी पर जितना भी लिखा जाए, कम है। 10 साल की स्मृतियां कम शब्दों में तो सिमट नहीं सकतीं लेकिन दो एक प्रसंग जो उनके संवेदनशील मन को उजागर करते हैं और जिनसे उनका हिंदी प्रेम झलकता है, वह देना आवश्यक समझता हूं। उनकी पत्रकारिता 'न दैन्यम् न पलायनम्' की पक्षधर थी। उन्होंने सच को सच की तरह ही उजागर किया। पत्रकारिता में सुदामा वृत्ति उन्हें पसंद नहीं थी। उनका मानना था कि हिंदी अपने आप में सक्षम और सशक्त भाषा है और हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी की बैसाखी की कोई आवश्यकता नहीं है। यही वजह है कि आनंद बाजार प्रकाशन समूह के 'रविवार' के बाद एसपी को जब दिल्ली के एक राष्ट्रीय पत्र में जुड़ने का प्रस्ताव आया और बताया गया कि अंग्रेजी अखबार का अनुवाद ही हिंदी अखबार में दिया जाए तो उन्होंने वहां से हटना ही श्रेयस्कर समझा। उसके बाद वे दिल्ली में 'द टेलीग्राफ' के राजनीतिक संपादक और फिर हिंदी के पहले निजी समाचार चैनल 'आज तक' के रूपकारों में रहे।
संवेदनशील इतने थे कि लोगों के दर्द को अपना दर्द समझते थे और उसे शिद्दत से महसूस भी करते थे। मेरे खयाल से यह अत्यंत संवेदनशीलता ही उनके असमय निधन का कारण बनी। दिल्ली के 'उपहार' सिनेमा के अग्निकांड में मृत लोगों के परिजनों का दर्द उन्होंने अपनी आंखों से देखा और दिल की गहराइयों से झेला। शनिवार को यह कार्यक्रम 'आज तक' में पेश करते वक्त उनकी आंखें नम थीं। वे कह गये 'ये थीं खबरें आज तक। इंतजार कीजिए सोमवार तक।' फिर वह सोमवार कभी नहीं आया। रविवार के दिन वे मस्तिष्काघात से संज्ञाशून्य हुए और फिर उन्हें बचाया नहीं जा सका। वैसे, एसपी जैसे व्यक्तित्व मरा नहीं करते। वे अपने कार्य से जीवित रहते हैं। भौतिक रूप से वे भले न हों लेकिन जब तक विश्व में सार्थक, सामाजिक सरोकार से जुड़ी पत्रकारिता है एसपी जीवित रहेंगे। लोगों के विचारों, कार्यों में एक सशक्त प्रेरणास्रोत के रूप में जीवित रहेंगे। मेरा उस महान आत्मा को शत-शत नमन।
(लेखक राजेश त्रिपाठी कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। कोलकाता के लायंस क्लब की ओर से 'श्रेष्ठ पत्रकार', कटक (उड़ीसा) की लालालाजपत राय विचार मंच संस्था से 'श्रेष्ठ हिंदी पत्रकार' के रूप में सम्मानित हो चुके हैं। व्रिक्रमशिला विद्यापीठ भागलपुर (बिहार) से विद्या वाचस्पति की मानद उपाधि। अनेक बाल उपन्यास, उपन्यास, कहानियां, कविताएं पत्र-पत्रकाओं में प्रकाशित। साहित्य अकादमी की 'हूज हू आफ इडियन राइटर्स' में परिचय प्रकाशित। रविवार, जनसत्ता, प्रभातखबर डाट काम में कार्य करने के बाद संप्रति हिंदी दैनिक सन्मार्ग, कोलकाता से संबद्ध। राजेश से संपर्क rajeshtripathi@sify.com के जरिए किया जा सकता है)

संकलनः- वैभव छाया